द्रोणप्रतिज्ञा

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देवेंद्र भारद्वाज द्वारा लिखित काव्य कथा महाभारतकालीन पौराणिक कथाओं की पृष्ठभूमि से अवतरित हुई है। इसके प्रमुख पात्र द्रोणाचार्य के आरंभिक जीवन की कठिनाईयों और संघर्ष के साथ ही तात्कालिक सामाजिक रीति-रिवाज और मान्यताओं का भी इसमें समावेश है। द्रोणाचार्य बहुत प्रतिभा संपन्न तो थे ही, साथ ही वर्ण व्यवस्थानुसार अपने ब्राह्मणत्व पर भी गर्व करते थे, उसी के अनुसार आचरण भी करते थे। उस समय तक ब्राह्मणों ने सेवावृत्ति स्वीकार कर सुखमय जीवन प्रारंभ कर दिया था। किंतु द्रोण ने सदा उसका प्रतिकार ही किया। उनका स्पष्ट मत था कि ब्राह्मण को केवल विद्या दान का अधिकार है। विद्या के बदले में वृत्ति लेना अपने ब्राह्मण धर्म से पतित होना है। कालांतर में द्रोण गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं, अश्वत्थामा का जन्म होता है, शिशु अवस्था में माँ का दूध छूटने के बाद अश्वत्थामा लगभग 12 वर्ष का हो गया, तब तक उसने गाय के दूध का रंग देखा न स्वाद चखा। ये विपन्नता की पराकाष्ठा ही थी या कहो द्रोणाचार्य के ब्राह्मणत्व के सिद्धांतों पर अडिग रहने की सजा। एक दिन जब अश्वत्थामा अपने पड़ोसी ऋषिकुमारों के साथ खेल रहा था तो सभी को दूध पीने के लिए उनके घरवाले बुलाते हैं। अश्वत्थामा जिज्ञासावश एक साथी के पीछे – पीछे चला जाता है, उसके घर जाकर देखता है कि धेनु का दूध एक सफेद रंग का तरल पदार्थ होता है। वह अपने घर आकर गाय का दूध पीने की जिद करता है। उसे दूध पिलाने की कोशिश में द्रोणाचार्य कई संपन्न ब्राह्मणों से एक गाय की याचना करते हैं किंतु कोई नहीं देता। वह मन रखने के लिए अश्वत्थामा को चुपके से चावल का घोल बनाकर दे देते हैं। इस बात का पता चलने पर नगरवासियों द्वारा न केवल अश्वत्थामा बल्कि द्रोणाचार्य का भी बहुत उपहास किया जाता है। आहत द्रोण हरिद्वार छोड़कर अपने बचपन के मित्र द्रुपद से आश्रय पाने की आस लिए पांचाल चले जाते हैं। किंतु द्रुपद पहचानने और मित्र मानने से इनकार कर देता है, साथ ही भरी सभा में द्रोण को अपमानित भी करता है। बस यहीं से द्रोणाचार्य के ब्राह्मणत्व को भयंकर आघात लगा और निश्चय कर लिया कि अब मैं भी समर्थ बनूँगा, बदला लूँगा। इस प्रण को पूरा करने के लिए उन्हें अपने सिद्धांतों के साथ समझौता करके सेवावृत्ति भी स्वीकारनी पड़ी। अपना प्रण पूरा किया। द्रुपद को पांडवों ने बंदी बनाकर द्रोण के सामने खड़ा कर दिया। किंतु अपने पुराने प्राणों से प्यारे मित्र की दयनीय दशा देख द्रोण का मित्र प्रेम जाग उठा और जीतकर भी आधा राज्य द्रुपद को वापस कर दिया। द्रोण राजा बन गये थे। किंतु फिर भी महाराज कहलाने की अपेक्षा उन्होंने आचार्य कहलाना ही पसंद किया और सिद्ध किया कि राज्य पाने के बाद भी उनके अंदर ब्राह्मण अथवा एक विद्यादान करने वाले आचार्य होने का गौरव प्रमुखता से विद्यमान था।
काव्य-कथा द्रोण प्रतिज्ञा में राजनीति , अर्थनीति ,कूटनीत के साथ तंत्र, मंत्र ,यंत्र अस्त्र व शास्त्र सबकी गहराई से व्याख्या की गई है।

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