
आज शिवरात्रि पर प्रयागराज में चल रहे कुम्भ मेले का समापन है। इस बार कुम्भ के प्रारम्भ में ग्रहों का ऐसा योग बना था, जो 144 वर्षों बाद दिखाई दिया तो, प्रत्येक 12 वर्षों में लगने वाले महाकुम्भ का महत्व धार्मिक दृष्टि से बहुत अधिक बढ़ गया। ऐसा अनुमान है की इस बार मेले में 65 करोड़ लोग स्नान कर चुके है। इतने बड़े आयोजन में छोटी मोटी बातों को छोड़ दे तो, मेले की व्यवस्था के लिए योगी सरकार ने शानदार काम किया है । प्रयाग मे त्रिवेणी अर्थात गंगा यमुना सरस्वती का संगम हे। जहा गंगा व् यमुना तो दिखाई देती हैं, पर सरस्वती अदृष्य है। सरस्वती को ज्ञान की देवी कहा जाता है ,और ज्ञान मनुष्य के चित में विचारो के रूप में रहता है। जो सदैव प्रवाहित होते रहते है | प्राचीन काल में समाज को चलाने वाले नियम शास्त्रार्थ के माध्यम से बनाये या हटाए जाते थे या उन्हें संशोधित किया जाता था।( ठीक आज संसद की बहसों की तरह) मानवीय ज्ञान का ये प्रवाह ही वास्तव में सरस्वती है जो प्रत्यक्ष दिखाई देती है। और इनका मिलना ही त्रिवेणी है। कुम्भ की कथा को सागर मंथन से जोड़ा जाता है। इतने बड़े जनसमुदाय का किसी विषय पर शास्त्रार्थ करना विचारों के सागर का मंथन ही, सागर मंथन है जहाँ किसी तर्क के पक्ष में और विपक्ष मे वाद प्रतिवाद से निकलने वाले परिणाम ही रत्नो का रूप धारण कर लेते है, पर विचार हमेशा कल्याणकारी हो ये जरूरी नहीं विनाशकारी भी हो सकते है , ये ही हलाहल विष है, जिसको लोककल्याण के लिए स्वयं कष्टों का वरण कर धारण करे वही महादेव है। इस रूप में महादेव ही जन कल्याणकारी लोकतंत्र के जनक है। इसलिए वो देवता या दानवो में भेद नहीं करते सभी को सामान रूप से देखते है, वरदान देते है। यही कारण है की भारत के जनसमुदाय में लोकतंत्र आस्था का विषय है। किसी भी सभा का अंत सबके कल्याण सबके कष्टों के अंत अर्थात शिव स्वरूप में होता है। आइये हम सभी इसका उत्सव मनाये।
इसी भावना से ही आज से ओजस्वी न्यूज.कॉम का शुभारम्भ किया जा रहा है।
सब को शिवरात्रि की शुभकामनाए








