डॉ. केशव राव बलिराम हेडगेवार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी, हिंदुत्व विचारधारा के प्रबल समर्थक, और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संस्थापक थे। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्र, समाज और हिंदू संस्कृति को सशक्त बनाने के लिए समर्पित था। उन्होंने अपने नेतृत्व और संगठनात्मक कौशल से न केवल एक शक्तिशाली संगठन की नींव रखी, बल्कि भारतीय समाज में आत्मनिर्भरता और अनुशासन का बीज भी बोया।

प्रारंभिक जीवन
डॉ. हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को महाराष्ट्र के नागपुर में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता बलिराम पंत हेडगेवार वेदों और शास्त्रों के ज्ञाता थे, और उनकी माता रेवतीबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। बचपन से ही केशव में देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी। स्कूली शिक्षा के दौरान, उन्होंने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ गाने के कारण स्कूल से निष्कासित कर दिए गए। इसके बाद उन्हें यवतमाल और पुणे में शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा गया।
क्रांतिकारी विचारधारा और शिक्षा
मैट्रिक पास करने के बाद, हिंदू महासभा के अध्यक्ष बीए मुंजे के मार्गदर्शन में उन्होंने कोलकाता के मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए प्रवेश लिया। वहां, उन्होंने अनुशीलन समिति नामक क्रांतिकारी संगठन से जुड़कर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया। 1915 में नागपुर लौटने के बाद, वे कांग्रेस की राजनीति में शामिल हुए और विदर्भ प्रांतीय कांग्रेस के सचिव बने।
कांग्रेस से मोहभंग
डॉ. हेडगेवार ने 1920 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखा, लेकिन यह पारित नहीं हो सका। 1921 में, उन्होंने असहयोग आंदोलन के तहत सत्याग्रह किया और एक वर्ष की जेल यात्रा की। हालांकि, 1923 में खिलाफत आंदोलन और सांप्रदायिक दंगों ने उन्हें कांग्रेस की राजनीति से विमुख कर दिया। उन्होंने महसूस किया कि हिंदू समाज को सशक्त करने के लिए एक अलग संगठन की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना
डॉ. हेडगेवार ने 1925 में विजयदशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना की। उनका उद्देश्य हिंदू समाज को एकजुट करना, राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करना और युवाओं को अनुशासन, सेवा एवं त्याग की भावना से प्रेरित करना था। संघ को राजनीति से दूर रखते हुए, उन्होंने इसे एक सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन के रूप में विकसित किया। प्रारंभ में, यह संगठन एक छोटे समूह के रूप में शुरू हुआ, लेकिन आज यह दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बन चुका है।
संगठनात्मक कौशल और नेतृत्व
मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित: ।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते।।26।।
जो व्यक्ति भौतिक गुणों के संसर्ग के बिना अहंकार रहित, संकल्प तथा उत्साहपूर्वक अपना कर्म करता है और सफलता अथवा असफलता में अविचलित रहता है,वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।
इस विचार से डॉ. हेडगेवार ने संघ में व्यक्ति-पूजा को पूरी तरह से अस्वीकार किया। उन्होंने भगवा ध्वज को संघ का गुरु घोषित किया, जिससे संगठन में स्थायित्व बना रहे। 1929 में, स्वयंसेवकों ने उन्हें सरसंघचालक के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने संघ को एक विचार-केन्द्रित संगठन बनाया और अनुशासन को उसकी रीढ़ बनाया। उनकी दूरदृष्टि का ही परिणाम था कि संघ ने हिंदू समाज को एक नई दिशा दी।
हिंदुत्व और सामाजिक योगदान
संघ के माध्यम से, डॉ. हेडगेवार ने हिंदू समाज को संगठित करने और आत्मनिर्भरता की भावना विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने गुरुपूजन की परंपरा शुरू की, जिससे संघ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना। उनके विचारों का प्रभाव यह था कि स्वयंसेवक केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक और राष्ट्रसेवा के कार्यों में भी सक्रिय हो गए।
सरसंघचालक परंपरा और विरासत
संघ में सरसंघचालक पद की स्थापना 1929 में हुई थी, और स्वयंसेवकों ने सर्वसम्मति से डॉ. हेडगेवार को पहला सरसंघचालक चुना। उन्होंने इस पद को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय न बनाकर संगठनात्मक अनुशासन और सेवा का प्रतीक माना। उनके निधन के बाद, गुरुजी (एम. एस. गोलवलकर) ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और संघ को एक व्यापक आंदोलन में परिवर्तित किया।
डॉ. हेडगेवार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सरसंघचालक का पद व्यक्ति की प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि संगठन की विचारधारा और अनुशासन से जुड़ा है। यह परंपरा आज भी संघ में बनी हुई है, जहां प्रत्येक सरसंघचालक संगठन को प्राथमिकता देता है और सेवानिवृत्ति के बाद भी अनुशासित स्वयंसेवक की भूमिका निभाता है।
अंतिम दिन और विरासत
21 जून 1940 को डॉ. हेडगेवार का निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा स्थापित संगठन और विचारधारा आज भी जीवंत है। उनकी समाधि रेशमबाग, नागपुर में स्थित है। उन्होंने सरसंघचालक की एक अनुशासित परंपरा स्थापित की, जिसे उनके उत्तराधिकारियों ने पूरी निष्ठा से निभाया।
निष्कर्ष
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा थे। उन्होंने हिंदू समाज को संगठित करने का जो बीज बोया, वह आज एक वटवृक्ष बन चुका है। उनका जीवन अनुशासन, त्याग और राष्ट्रसेवा का प्रतीक है। उनकी दूरदृष्टि और संगठनात्मक क्षमता ने भारतीय समाज को एक नई दिशा दी, जिससे राष्ट्रवाद की भावना मजबूत हुई। उनका योगदान भारत के इतिहास में सदा स्मरणीय रहेगा।
महेंद्र शर्मा







आदरणीय डॉक्टर केशव हहेडगेवार एवं RSS पर शानदार ज्ञान वर्धक लेख के लिए साधुवाद