हमारे पुरखों ने शक्ति पूजा का विशेष विधान किया है ।

वर्ष में दो नवरात्र चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र के अलावा दो गुप्त नवरात्र भी होते हैं ।
मेरा मानना है कि उस समय की काल परिस्थितियों के अनुसार भी और आज भी शक्ति की पूजा, शक्ति की उपासना जरूरी है
स्वयं के आत्म सम्मान,अपनी परंपरा, संस्कार,संस्कृति की रक्षा और राष्ट्रीय अस्मिता के लिए।
मेरा मानना है कि हमारे पूर्वजों ने इसी हेतु से शक्ति उपासना का विधान किया कि हम अपनी शक्ति और सामर्थ्य की विवेचना और आत्मा अवलोकन कर सकें।
शक्ति सामर्थ्य को सहेजने उसे फिर से जागृत करने, उसकी समीक्षा करने के लिए ऐसे पर्वों की रचना की होगी जब समाज अपने सामर्थ्य का, अपनी शक्ति का व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से चिंतन करता होगा, आत्मावलोकन करता होगा और उसके पश्चात शक्ति अर्जित करने के लिए गुप्त नवरात्रों के दौरान अपने सामर्थ्य को बढ़ाने का प्रयास करता होगा।
मुझे नहीं लगता कि आज की तरह केवल डांडिया नृत्य या डीजे पर डांस करके शक्ति की आराधना का कोई पर्व मनाया जाता होगा।
अब तो व्यवसाय के नाम पर हमारे शक्ति की आराधना पर्व किस स्तर पर आ गए यह किसी से छुपा नहीं है।
जिस तरह के प्रचार और मार्केटिंग के लिए शब्दावली, फोटो का चयन किया जाता है,विकृति के साथ क्या वह अन्य मजहबी पर्वों पर किया जा सकता है?
भारत क्या है? भारत शक्ति का आराधक,संवाद का समर्थक और विचार प्रवाह की निरंतरता का पोषक रहा है…..पर परकीय शासन के दौरान सब कुछ उल्टा हुआ,शक्ति की जगह सब कुछ सहन करने,संवाद की जगह सुनने,विचार प्रवाह की जगह लोगों के विचार सुनने-मानने की मजबूरी को अंगीकार कर लिया।
विचारों के आदान-प्रदान का स्वातंत्र्य भारत का मूल विचार है। नए विचारों का सदैव स्वागत हुआ है। विरोधी विचार को भी सुनने का, उसे अपनी बात रखने का अधिकार सदैव रहा है। यही कारण है कि विचारों के बड़े-बड़े आयोजनों का उल्लेख इतिहास में हमें मिलते है।
पराधीनता के काल में जब समाज पर हमले हुए ऐसे आक्रांताओं से समाज का सामना हुआ जिनके सामने दुनिया की कई सभ्यताएं मटियामेट हो गई ।तो जिसे जिस रूप में भी लगा वह परंपराओं का, संस्कारों का, विचारों का रक्षण कर सकता है उसने उसी रूप में अपने प्रयास किये।
उसके कारण समाज में कुछ विकृतियों का आना स्वभाविक था और वह आई है ।
आक्रांता जब शासक बने तो उन्होंने न केवल यहां की संपदा को लूटा बल्कि बौद्धिकता को भी तार-तार करने की कोशिश की ।हम सदैव गुलाम बने रहे इस उद्देश्य से हमारी बौद्धिक प्रतिभा को समाप्त करने के षड्यंत्र के तहत हमारे ग्रंथ, हमारे साहित्य, हमारी शिक्षा के केंद्र जला दिए गए। हमारे गौरव स्थल नष्ट कर दिए गए ।
यह शक्ति का पर्व चल रहा है। मेरा मानना है समाज के सब लोगों को आत्मावलोकन करना चाहिए, बांग्लादेशी,रोहिंग्या घुसपैठिए बड़ी संख्या में देश में बसे हुए है।रोहिंग्या की बड़ी संख्या देश को चुनोती है। शिक्षा के मंदिरों में भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे लगाने का दुस्साहस करने वाले लोग है।कश्मीर भारत का नहीं ऐसा कहने वाले राजनेता हैं ।विभिन्न जातियों के नाम पर, विभिन्न क्षेत्रों के नाम पर आपस में भाइयों को लड़ाने के षड्यंत्र चल रहे हैं ऐसे में समय की मांग है कि हम आत्म चिंतन करें कि क्या हमें स्वयं की प्रतिष्ठा, जातीय गौरव की ज्यादा आवश्यकता है या राष्ट्रीय अस्मिता को सुरक्षित करने की ?
आप स्वयं विचार कीजिए ….?
चैत्र नवरात्र २०८२
प्रथम दिवस
फोटो सभार सोशल मीडिया






