राजस्थान पुलिस के जवान नहीं खेल पाए होली, किया मेस का बहिष्कार
मैं हर गली चौराहों पर साहबों, माननीयों की संतानों से गरियाया जाता हूं।
18 घंटे काम कर जब खाना खाने जाता हूं
तो मैस की अधपकी रोटियों ,पानी से भी पतली दाल में गोता लगाता हूं।
जैसे-तैसे पेट भर पाता हूं।
हां साहब….. में ठुल्ला कहलाता हूॅं।
आप जब एसी कमरों में सो जाते हो,
सर्दी, गर्मी, बरसात, दिन हो या रात;
उसी ड्रेस में जो धोई थी पिछली रात…
चौराहों पर ड्यूटी बजाता हूं।
हां साहब…. मैं ठुल्ला कहलाता हूॅं।
मैं, मेरे बच्चे मेरी पत्नी नहीं मिल पाते हफ्ते और महीने
महंगी कोचिंगो में उन्हें नहीं पढ़ पाता हूं।
कैसा होगा उनका करियर, बात नहीं कर पाता हूं।
जब पत्नी होती है बीमार उसे जरूरत होती है मेरी हर बार, पर हॉस्पिटल जाकर डॉक्टर को नहीं दिखा पाता हूं।
हां साहब…. मैं ठुल्ला कहलाता हूॅं।
बूढ़े हैं मेरे मां-बाप,
उनकी सेवा नहीं कर पाना है श्राप…
परेड की कदमताल में,
उनकी बेबस पुकार नहीं सुन पाता हूं।
हां साहब…. मैं ठुल्ला कहलाता हूं।
मैं तुकाराम ओंबले हूं।
लाठी लेकर कसाब से भीड़ जाता हूं।
पेट में 46 गोलियां खाता हूं।
….और मर जाता हूं।
हां साहब…. मैं ठुल्ला कहलाता हूं।
फीके पड़ गए सब रंग मेरे होली नहीं माना पाता हूं।
दीपावली के जगमग दियों में, खुद को अंधेरे में पाता हूं।
बरसते रहे रंग आपके जीवन में,
खुशियों की फुलझड़ी जलती रहे।
आपकी हंसी में अपनी खुशी देख पाता हूं।
हां साहब…. मैं ठुल्ला कहलाता हूं।
फोटो सभार सोशल मिडिया






